Rastriya education policy
राष्ट्रीय शिक्षा नीति ड्राफ्ट 2019
राष्ट्रीय शिक्षा नीति जिस का मसौदा वर्ष 2017 से भारत के वरिष्ठ वैज्ञानिक के.कस्तूरीरंगन की अध्यक्षता में तैयार किया जा रहा था जो अब अपना वास्तविक स्वरूप धारण कर चुका है और इस मसौदे को जनता जनार्दन के विचार विमर्श के लिए सार्वजनिक किया गया है जिससे कि यह अपना वास्तविक रूप ले उससे पहले राष्ट्र के प्रत्येक हिस्से से बुद्धिजीवी और वरिष्ठ अनुभवी ओं की सलाह मशवरा के लिए व भारत के सभी प्रांतों से इसकी सहमति ता की जांच हो सके सभी के मतों से स्वीकृति मिलने के बाद इससे बिल नियम और अधिनियम मैं बदला जाए इसकी प्रक्रिया शुरू कर दी गई है आगामी सत्र मैं इसे मानव संसाधन विकास मंत्रालय की तरफ से मानव संसाधन विकास मंत्री श्री रमेश पोखरियाल निशंक विल के रूप में सदन में चर्चा के लिए पेश करेंगे संसद के दोनों सदनों एवं राष्ट्रपति की मुहर लगने के बाद ही यह अधिनियम का रूप धारण करेगा
समस्या मत भिन्नता
इसमें समस्या का उद्गार तब होता है जब मूलभूत शिक्षा में बच्चों में भाषाई समझ विकसित करने के लिए उन्हें कम से कम तीन भाषाओं का ज्ञान अवश्य हो जिससे वह लिखने और समझ में मैं सहजता महसूस करें यह तीन भाषाएं इस प्रकार हैं
१ अंतरराष्ट्रीय भाषा के रूप में अंग्रेजी को लिया गया जिससे कि विद्यार्थी आगे चलकर विभिन्न देशों में अपनी सेवा को संचालित करने में सक्षम रहे
समस्या का त्वरित समाधान तो नहीं किंतु दीर्घकालिक समाधान यह है की विद्यार्थियों और नागरिकों मैं एक मानक भाषा जिसे कि पूरे राष्ट्र में बढ़ावा मिलना चाहिए उसे सीखने और समझने की ललक को बढ़ाया जाए साथ ही राजनीतिक घरेलू विरोध ना किया जाए जिससे कि जनमानस में भी आक्रोश उत्पन्न होता है विगत वर्षों में गुजरात महाराष्ट्र पंजाब उड़ीसा झारखंड जैसे राज्यों नेभी हिंदी को समझना और आपसी बातचीत करना सीख लिया इसका कारण यह है कि उत्तर भारत के नागरिक रोजगार की तलाश में इन राज्यों में भ्रमण करते हैं और अपनी छाप अपनी भाषा सिखाते हैं और क्षेत्रीय भाषा सीखते हैं जिससे कि इन राज्यों में हिंदी के विषय में जो सुगमता पैदा हुई है उसका कारण दो अलग-अलग भाषाई व्यक्तियों का जुड़ाव तथा विचारों का आदान-प्रदान ऐसे ही दक्षिण भारतीय तथा उत्तर पूर्वी राज्य के नागरिक यदि अधिक से अधिक संख्या में उत्तर भारतीयों तथा हिंदी भाषियों के संपर्क में आएंगे तो यह भाषाई समझ जल्द ही विकसित हो जाएगी इसके लिए सरकार की भूमिका तथा क्षेत्रीय राजनेताओं की सकारात्मक भागीदारी आवश्यक है यदि क्षेत्रीय राजनेता अपने व्यक्तिगत हित और लाभ के लिए भाषाई मुद्दे पर जहर उगलते रहेंगे तो आने वाले समय में भारत भाषा की क्षेत्रीय विविधता के कारण और भी जहरीला होता जाएगा🙏🇮🇳
यदि इस समस्या के विषय में आपके पास समाधान हैं तो कृपया कर हमें कमेंट कर बताएं बहुत-बहुत शुक्रिया आपका धन्यवाद
राष्ट्रीय शिक्षा नीति जिस का मसौदा वर्ष 2017 से भारत के वरिष्ठ वैज्ञानिक के.कस्तूरीरंगन की अध्यक्षता में तैयार किया जा रहा था जो अब अपना वास्तविक स्वरूप धारण कर चुका है और इस मसौदे को जनता जनार्दन के विचार विमर्श के लिए सार्वजनिक किया गया है जिससे कि यह अपना वास्तविक रूप ले उससे पहले राष्ट्र के प्रत्येक हिस्से से बुद्धिजीवी और वरिष्ठ अनुभवी ओं की सलाह मशवरा के लिए व भारत के सभी प्रांतों से इसकी सहमति ता की जांच हो सके सभी के मतों से स्वीकृति मिलने के बाद इससे बिल नियम और अधिनियम मैं बदला जाए इसकी प्रक्रिया शुरू कर दी गई है आगामी सत्र मैं इसे मानव संसाधन विकास मंत्रालय की तरफ से मानव संसाधन विकास मंत्री श्री रमेश पोखरियाल निशंक विल के रूप में सदन में चर्चा के लिए पेश करेंगे संसद के दोनों सदनों एवं राष्ट्रपति की मुहर लगने के बाद ही यह अधिनियम का रूप धारण करेगा
समस्या मत भिन्नता
इसमें समस्या का उद्गार तब होता है जब मूलभूत शिक्षा में बच्चों में भाषाई समझ विकसित करने के लिए उन्हें कम से कम तीन भाषाओं का ज्ञान अवश्य हो जिससे वह लिखने और समझ में मैं सहजता महसूस करें यह तीन भाषाएं इस प्रकार हैं
१ अंतरराष्ट्रीय भाषा के रूप में अंग्रेजी को लिया गया जिससे कि विद्यार्थी आगे चलकर विभिन्न देशों में अपनी सेवा को संचालित करने में सक्षम रहे
२ एक ऐसी भाषा जिससे राष्ट्र के बहुसंख्यक नागरिक इस्तेमाल करते हैं लगभग 60 फीसद जो है हिंदी भाषा जिसे समग्र भारतवर्ष पढ़ने-लिखने और समझने की दृष्टि से सुगम बनाया जाए सके इसके लिए हिंदी को अनिवार्य किया गया जो कि राष्ट्र में भाषाई अलगाववाद को समाप्त करने में मैं सक्षम साबित हो सकती है
३ तीसरी एक ऐसी भाषा जो कि क्षेत्रीय भाषा है तथा बच्चे की मातृभाषा भी क्योंकि संपूर्ण भारत में अलग-अलग प्रांतों राज्यों में अलग-अलग भाषाएं बोली जाती
इन 3 भाषाओं में हिंदी व अंग्रेजी को संपूर्ण भारत के लिए अनिवार्य रखा गया तथा तीसरी भाषा जोकि आधुनिक भाषा (तमिल तेलुगू मलयालम असमिया उड़िया पंजाबी महाराष्ट्र कोंकणी मणिपुरी नेपाली बांग्ला इत्यादि संविधान में वर्णित सभी 22 भाषाओं में से कोई भी हो सकती हैं )जिससे राज्य सरकार तय करेगी कि वह किस भाषा को आधुनिक भाषा के रूप में रखना चाहिए है तीसरी भाषा के रूप में अपनी क्षेत्रीय भाषा या विद्यार्थी के हिसाब से मातृभाषा का चयन कर सकते हैं आक्रोश इस बात का कि दक्षिण भारतीय कहते हैं कि हिंदी जबरन थोपा जा रहा है वे कहते हैं की उत्तर भारती आधुनिक भाषा के रूप में मलयालम और तेलुगू या तमिल को कभी स्वीकार नहीं करेंगे जबकि दक्षिण भारतीय को हिंदी अनिवार्य रूप से पढ़ना पड़ेगा इससे दक्षिण भारतीयों की भाषा को दबाया जा रहा है और इसी के चलते राजनीतिक बयान बाजी भी जारी है
राजनीति में यह देखा जाता है समस्या ना होते हुए समस्या को पैदा किया जाता है जो निजी हितों के चलते अपने व्यक्तिगत लाभ घरेलू राजनीति जो कि उन्हें लंबे समय से जीवंत प्रदान करते आई है ऐसा नहीं है वे इसकी जटिलता को नहीं जानते लेकिन क्या करें इसमें उनके निजी हित जुड़े हुए हैं जो देश के लिए उतने ही ज्यादा घातक हैं जितना कि उनके लिए व्यक्तिगत🇮🇳🙏
समस्या के कारण.
स्वतंत्रता प्राप्ति के साथ ही भाषाई आधार पर राज्यों के पुनर्गठन की मांग के मुद्दे नजर संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ राजेंद्र प्रसाद ने 27 नवंबर 1947 को न्यायमूर्ति एस के धर की अध्यक्षता में 4 सदस्य भाषाई प्रांत आयोग का गठन किया आयोग ने 10 दिसंबर 1948 को प्रस्तुत रिपोर्ट में भाषा की जगह प्रशासनिक भौगोलिक वित्तीय एवं विकास की सुविधा के आधार पर राज्यों के पुनर्गठन का सुझाव दिया था
उल्लेखनीय है कि कांग्रेस कार्यसमिति ने ही राज्यों के पुनर्गठन के संदर्भ में एस के धर की रिपोर्ट के मुद्दे नजर जवाहरलाल नेहरू वल्लभभाई पटेल तथा पत्तभी सीतारमय्या (JVP) की तीन सदस्यीय समिति का गठन किया था इस समिति ने भी 1 अप्रैल 1949 को प्रस्तुत अपनी रिपोर्ट में भाषाई आधार पर राज्यों के पुनर्गठन का विरोध किया
तभी मद्रास राज्य की तेलुगू भाषियों के लिए भाषा के आधार पर अलग राज्य के गठन की मांग का समर्थन करते हुए पोट्टी श्रीरामलू आमरण अनशन प्रारंभ कर दिया तथा उनकी मृत्यु 56 दिनों बाद 15 दिसंबर 1952 को हो गई फल स्वरूप वहां की राजनीतिक व्यवस्था और हिंसात्मक अस्थिरता को देखते हुए जवाहरलाल नेहरू ने तेलुगू भाषियों के लिए अलग राज्य आंध्रप्रदेश के गठन की घोषणा कर दी
जिसका गठन 1 अक्टूबर 1953 को किया गया यह भाषाई आधार पर गठित होने वाला देश का प्रथम राज्य था तत्पश्चात तेलुगू वासियों के लिए पृथक राज्य के गठन के पश्चात अन्य भाषा भाषियों की मांग भी तेज हो गई
जिस पर विचार के लिए 1953 में फजल अली आयोग का गठन किया गया न्यायमूर्ति फजल अली की अध्यक्षता में 3 सदस्य आयोग (k.m. पानिक्कर हृदयनाथ कुंजू तथा फजल अली )राज्य पुनर्गठन आयोग गठित किया आयोग ने 30 दिसंबर 1955 को अपनी रिपोर्ट केंद्र सरकार को सौंपी इस रिपोर्ट के आधार पर राज्य पुनर्गठन अधिनियम 1956 पारित किया गया इस अधिनियम के अनुसार संविधान में 7 वां संशोधन किया गया और मूल संविधान के राज्यों के चार श्रेणी का खा गा और घर को हटाकर 14 राज्यों और 5 केंद्र शासित प्रदेशों का गठन किया गया आगे और अस्थिरता और अलगाव की स्थिति देखते हुए राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों का गठन किया
समस्या का समाधान
समस्या का त्वरित समाधान तो नहीं किंतु दीर्घकालिक समाधान यह है की विद्यार्थियों और नागरिकों मैं एक मानक भाषा जिसे कि पूरे राष्ट्र में बढ़ावा मिलना चाहिए उसे सीखने और समझने की ललक को बढ़ाया जाए साथ ही राजनीतिक घरेलू विरोध ना किया जाए जिससे कि जनमानस में भी आक्रोश उत्पन्न होता है विगत वर्षों में गुजरात महाराष्ट्र पंजाब उड़ीसा झारखंड जैसे राज्यों नेभी हिंदी को समझना और आपसी बातचीत करना सीख लिया इसका कारण यह है कि उत्तर भारत के नागरिक रोजगार की तलाश में इन राज्यों में भ्रमण करते हैं और अपनी छाप अपनी भाषा सिखाते हैं और क्षेत्रीय भाषा सीखते हैं जिससे कि इन राज्यों में हिंदी के विषय में जो सुगमता पैदा हुई है उसका कारण दो अलग-अलग भाषाई व्यक्तियों का जुड़ाव तथा विचारों का आदान-प्रदान ऐसे ही दक्षिण भारतीय तथा उत्तर पूर्वी राज्य के नागरिक यदि अधिक से अधिक संख्या में उत्तर भारतीयों तथा हिंदी भाषियों के संपर्क में आएंगे तो यह भाषाई समझ जल्द ही विकसित हो जाएगी इसके लिए सरकार की भूमिका तथा क्षेत्रीय राजनेताओं की सकारात्मक भागीदारी आवश्यक है यदि क्षेत्रीय राजनेता अपने व्यक्तिगत हित और लाभ के लिए भाषाई मुद्दे पर जहर उगलते रहेंगे तो आने वाले समय में भारत भाषा की क्षेत्रीय विविधता के कारण और भी जहरीला होता जाएगा🙏🇮🇳
यदि इस समस्या के विषय में आपके पास समाधान हैं तो कृपया कर हमें कमेंट कर बताएं बहुत-बहुत शुक्रिया आपका धन्यवाद


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